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PARINEETA

आखिरकार परिणीता ने बाबाई दा को आत्महत्या करने के लिए मजबूर करनेवालों से लिया बदला

कोलकाता l आये दिन लोग प्यार में धोखा खा रहे हैं और यही खबरें, टीवी और अखबारों में प्रतिदिन छाई रहती है. समाज में प्रतिष्ठा पाने के लिए लड़कियां किस हद तक नीचे गिर सकती हैं, ये कोई सोच भी नहीं सकता. निर्देशक राज चक्रवर्ती की हालिया रिलीज हुई बांग्ला फ़िल्म 'परिणीता' कुछ ऐसी ही कहानी बयां करती है. यह फ़िल्म 6 सितंबर 2019 से सभी सिनेमाघरों में प्रदर्शित हो रही है.इस फ़िल्म में रितिक चक्रवर्ती, शुभोश्री गांगुली, गौरव चक्रवर्ती और विश्वजीत चक्रवर्ती हैं. वहीं अन्य भूमिका में तूलिका बासु, लाबनी सरकार, फलक रशिद रॉय, अदृत रॉय और सैम्युएल आलम हैं. फ़िल्म में म्यूजिक अर्को ने दिया है. वहीं फ़िल्म के लिए डायलॉग और स्क्रीनप्ले पद्मनाभ दासगुप्ता ने लिखा है.  राज चक्रवर्ती प्रोडक्शन्स के बैनर तले इस फ़िल्म का निर्माण किया गया है.फ़िल्म की कहानी: यह कहानी बारहवीं कक्षा की छात्रा मेहुल (शुभोश्री) और उसके ट्यूटर बाबाई दा (रितिक) की है. मेहुल मन ही मन बाबाई दा को पसंद करती है और उसके साथ शादी रचाने का ख्वाब भी देखती है. लेकिन बाबाईदा सायन्तिका (फलक रशिद रॉय) नामक एक लड़की के प्यार में हैं. इधर मेहुल पूरी तरह से इस बात से अनजान है. लेकिन होली के एक अवसर पर मेहुल जब बाबाई दा से मिलने जाती है तो वहां पहुँचने के बाद मेहुल को बाबाई दा सायन्तिका से मिलवाता है और उससे कहता है कि वह सायन्तिका से बेहद प्यार करता है. इस घटना के बाद मेहुल बाबाई दा से दूरी बना लेती है.

इधर सायन्तिका और बाबाई दा दोनों ही यूनिकर्ण नामक एक बहुराष्ट्रीय संस्था में कार्यरत हैं. उसी संस्था के प्रबंध निदेशक रणदेव सेन (गौरव चक्रवर्ती) की  कमजोरी बराबर उस ऑफिस की सारी हसीन लड़कियां ही रहीं हैं. देखते ही देखते रणदेव भी  सायन्तिका को अपनी ओर आकर्षित कर ही लेता है. एक दिन बाबाई दा सायन्तिका को रणदेव के साथ एक अंतरंग मुहूर्त के दौरान रंगे हाथों पकड़ लेता है. इस सच्चाई से बचने के लिए सायन्तिका बाबाई दा को उसके साथ छेड़छाड़ करने के झूठे केस में फंसा देती है. जिस वजह से बाबाई दा आत्महत्या करने पर मजबूर हो जाता है. लेकिन आत्महत्या करने से पहले बाबाई दा मेहुल को एक चिट्ठी दे जाता है जिसमें उसके साथ हुई नाइंसाफी की पूरी घटनाओं का उल्लेख रहता है. उसी चिट्ठी को पढ़कर मेहुल को सच्चाई का पता चल जाता है. इसके बाद मेहुल तय कर लेती है कि उसे भी किसी भी तरह से यूनिकर्ण में दाखिल होना होगा. काफी मशक्कत करने के बाद वह यूनिकॉर्न में नौकरी जुटाने में कामयाब हो जाती है. और धीरे-धीरे वह रणदेव के दिल मे अपनी जगह भी बना लेती है. आगे चलकर इसी का फायदा उठाकर आखिरकार वह रणदेव और उसकी पत्नी सायन्तिका (बाबाई दा के मरने के बाद रणदेव से शादी हुई थी) की ज़िंदगी बर्बाद कर देती है.

फ़िल्म कैसी लगी: एक 18-19 वर्ष की लड़की का किरदार निभाना वाकई शुभोश्री के लिए कठिन रहा होगा. निर्देशक ने भी इस चुनौती को स्वीकार किया है. पर्दे पर शुभोश्री के अभिनय को देखकर ऐसा लगता है कि उन्होंने पूरी फ़िल्म के दौरान अपने  किरदार को जिया है. शुभोश्री और रितिक के बीच की नोंक-झोंक के दृश्य आपको हंसने पर मजबूर कर देंगे. इसके अलावा दोनों की केमिस्ट्री भी सिल्वर स्क्रीन पर छाप छोड़ती हुई नजर आई. लेकिन कुछ-कुछ जगह में शुभोश्री का बचपना अत्याधिक लगा. जैसे पूरी फिल्म के दौरान उनकी सिंह की तरह दो चोटियां. बारहवीं कक्षा में पढ़ रही एक लड़की आजकल ऐसी चोटियां कहाँ बांधती है. पढ़ाई न करने के बावजूद भी मेहुल का 86 प्रतिशत अंक लेकर बारहवीं कक्षा उत्तीर्ण होना कुछ हद तक बेबुनियाद लगा.

लेकिन पूरी फ़िल्म के दौरान रितिक और शुभोश्री छाए रहें. वहीं मेहुल के भाई के चरित्र में सैम्युएल काफी ऑरिजिनल लगा. लगता है कि निर्देशक ने इस चरित्र को लेकर काफी गहराई से सोचा होगा. रणदेव के चरित्र में गौरव स्मार्ट लगे. फ़िल्म की कहानी इस फ़िल्म को अन्य फिल्मों से अलग करती है. फिल्म का संगीत वाकई कर्णप्रिय है.

ऑफिस पॉलिटिक्स के कुछ दृश्य को भी फ़िल्म में रखा गया है जो काफी समसामयिक है. शुभोश्री के कार्पोरेट लुक की भी दाद देनी चाहिये. अदृत और फलक एक छोटे से रोल में फिट लगे. फ़िल्म के प्रथम भाग में कुछ दृश्यों को फ्लैशबैक में दिखाया गया है. शायद ऐसा न भी होता तो भी चलता. जिस वजह से हाफ टाइम से पहले ही फ़िल्म कम्प्लीट लगी.

फ़िल्म का आखिरी दृश्य काफी भावुक करता है, जहां मेहुल रणदेव से बदला लेने के बाद घर आकर आपने आप से कहती है, बाबाई दा अनजाने में होली के दिन सिंदूर के साथ मिलाया हुआ रंग आपने मेरे सर पर लगाया था, उसी दिन से ही मैं आपकी पत्नी बन गई थी. मेरा आधा अधूरा संसार ही सही वह तो आपके साथ ही जुड़ा हुआ है. मैं आपकी परिणीता जो ठहरी. फ़िल्म में काफी ट्विस्ट भी रखा गया है, इससे दर्शकों की दिलचस्पी बढ़ेगी.
इतना सब कुछ होते हुए भी पूरी फिल्म में इंटेंसिटी की कमी पाई गई. फ़िल्म रितिक और शुभोश्री के लिए एकबार देखी जा सकती है. फ़िल्म को ऑडिएंस का काफी अच्छा रिस्पांस मिल रहा है.

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