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स्वस्थ भविष्य के लिए पढ़ें फियर वायरस:विजय गुप्ता

कोलकाता l जानेमाने धर्मगुरु तथा बिजनेसमैन श्री विजय गुप्ता(अंतर हिमालय) ने हाल ही में कोरोना महामारी पर एक किताब 'फियर वायरस' लिखी है. जब उनसे किताब के बारे में जब पूछा गया तो उन्होंने किताब के कुछ पहलुयों पर अपने विचार व्यक्त किये. तो लीजिये पेश है उनसे की गई बातचीत के मुख्य अंश-

 

1.फियर वायरस- इस किताब में ऐसा क्या है जिस पढ़ने के बाद लोगों की जिन्दगी बदल सकती है !

-मानसिक सम्प्रेषण करती है- हमारे शारीरिक ग्रंथियों को, फलस्वरुप हमारे शरीर में द्रव्यों और रसायनों का संचारण होता है। ये संचारण हमें विभिन्न भावनायें, जैसे-प्रेम, द्वेष, आनंद, भय इत्यादि की अनुभूति कराती है।

इस कोरोना काल में मानव समाज एक भ्रामिक भय जाल में उलझा पड़ा है। फलतः भय का संचार, उससे संबंधित रसायनों का संचारण हमारे शरीर में प्रवाहित कर रही है, अस्तु, मानव जाति संक्रमण का अनुभव कर रही है।

साक्षात्कार- रहस्योद्धाटन है, जो भ्रम जाल काटता है, फियर वायरस एक प्रयास है, साक्षात्कार का, भय से, सत्य से। यह पुस्तक आपकी चेतना को जागृत करता है, और चैतन्य प्रवाह सारे भय, भ्रम, प्रश्र का निराकरण करती है और आपके स्वस्थ्य भविष्य का पथ प्रदर्शित करती है।

2. इस किताब को लिखने का ख्याल कैसे आया?

-ख्याल, भावना इत्यादि एक प्रतिक्रिया है, जो कर्म का घोतक है।

बड़ी रोचक घटना है, मेरा दैहिक पुत्र, जो अभी वयःसंधि काल में है, लॉकडाउन में प्रसारित भ्रामक सुचनाओं से भयग्रस्त हो गया, ततक्षण मेरी जागृति भ्रम निवारण हेतु हुई, और यह रचना फियर वायरस मेरी चेतना के प्रेरणा स्वरुप हुई।

3. इस किताब को लिखने के लिये आपने किस तरह का अन्वेषण किया था?

-अन्वेषण बड़ी ही प्रयोगिक सब्द है, जो कल्पना देती है, एक प्रयोगशाला, जहां रासायनिक गंधोें और द्वंदों के मध्य जूझता व्हाइट कोर्ट में एक व्यक्ति, यह बाह्य रुप से सत्य भी है और प्रसंगिक भी, परन्तु साधक वर्ग अन्तर्गमन के पथ पर अग्रसित होते हैं, मेरी अन्वेशणा, मेरी साधना और मेरी चैतन्य अवतरण से अनुप्रेषित है, जहाँ में ध्यान में, इन्दीयों द्वारा रासायनों के प्रवाह का अवलोकन एवं उसके प्रभाव का निष्पादन की अनुसंशा करता हुं।

4. आपको इसे लिखने में कितने दिन लगे थे?  

-लिखने का काल तो भौतिक उपलब्धता पर निर्भर करता है, फलत: यह मेरे और मेरे सहयोगियों के भौतिक श्रम से तीन महीनों में लिखा गया, किंतु यह बोलना सर्वथा अनुचित होगा कि यह रचना तीन महीनों के ही श्रम है।

यह पुस्तक व मेरी आने वाली अनेक भौतिक श्रम तो कुछ महीनों का ही होंगे परन्तु यह ज्ञान अवतरण मेरी वर्षो की या जन्मो की साधना का चैतन्य प्रवाह है, जिसकी गणना, मेरी क्षमता से परे है।

5. क्या आप अपनी जिंदगी में किसी को अपनी प्रेरणा मानते है?

-प्रेरणा - एक बड़ा ही भ्रामक शब्द है, प्रेरणा से आप प्रभावित होते है, और किसी विषेश के पक्ष में आप आकर्षित होने लगतें है।

परन्तु मौलिक निर्माण, केवल प्रेरणा से संभव नहीं, उसके लिए सतत साधना अनिवार्य है, साधना हेतु मनुष्य स्वयं से ही स्वयं को प्रभावित करता है, अतः इस पुस्तक फियर वायरस की रचना हेतु मेरी प्रासंगिक प्रेरणा-मेरा ही चैतन्य रुप है।

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