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Piezoelectric Crystals

आईआईएसईआर, कोलकाता और आईआईटी खड़गपुर के वैज्ञानिकों ने दिखाया कमाल

कोलकाता,17 जुलाई(नि. स.)I इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एजुकेशन एंड रिसर्च (आईआईएसईआर) कोलकाता और आईआईटी खड़गपुर के वैज्ञानिकों ने मिलकर सामग्री (मैटीरियल) की एक नई श्रेणी की खोज की है जो फ्रैक्चर होने पर खुद को थाउजेंड फ्रैक्शन ऑफ सेकंड के भीतर ठीक कर सकती है। यह शोध अब साइंस (एएएएस) जर्नल में प्रकाशित हुआ है। उच्च किस्म के क्रिस्टेलाइन सामग्री, जब टुकड़ो में बंट जाते हैं, तो पलक झपकते ही स्वयं फिर से जुड़ जाती है, और खुद को इतनी सटीक रूप से सुधार सकती है कि वे अबाधित सामग्री से अप्रभेद्य हो जाते हैं। इन नई सामग्रियों को विभिन्न नए युग की प्रौद्योगिकियों में शामिल किया जा सकता है।

जी हां, प्रौद्योगिकियों में प्रयुक्त सामग्री लगातार यांत्रिक प्रभावों से गुजरती है जो अक्सर मरम्मत से परे उपकरणों को नुकसान पहुंचाती है. इसलिए वैज्ञानिक समय समय पर बाहरी हस्तक्षेप की आवश्यकता के बिना उपकरणों के जीवन काल को लम्बी करने के लिए स्व-मरम्मत सामग्री की खोज कर रहे थे. अब जाकर उनको कामयाबी मिली है.

इसके पीछे प्रो. सी मल्ला रेड्डी, आईआईएसईआर, कोलकाता, प्रो. निर्माल्य घोष, आईआईएसईआर, कोलकाता और आईआईटी खड़गपुर के प्रोफेसर भानु भूषण खाटुआ उल्लेखनीय हैं.

प्रो. सी मल्ला रेड्डी, जिन्होंने 2015 में विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग, भारत सरकार से प्रतिष्ठित स्वर्णजयंती फेलोशिप जीती थी, उन्होंने और आईआईएसईआर कोलकाता में उनकी टीम ने मिलकर ठोस सामग्री के एक नए वर्ग को संश्लेषित किया है, वह ये कि क्रिस्टेलाइन स्टेट में जो पोलर अरेंजमेंट्स होते हैं, वह टूटने पर उसके टूटे हुए हिस्से विपरीत विद्युत क्षमता उत्पन्न करती है। यही विद्युत क्षमता बिना किसी बाहरी हस्तक्षेप के टूटे हुए क्रिस्टल के तत्काल पुनर्संयोजन और स्व-मरम्मत की अनुमति देते हैं। 

वहीं आईआईएसईआर कोलकाता के प्रो. निर्माल्य घोष और उनकी टीम ने नैनोमीटर पैमाने के स्थानिक विभेदन के साथ पीजोइलेक्ट्रिक सेल्फ-हीलिंग ऑर्गेनिक क्रिस्टल के संरचनात्मक क्रम की जांच और मात्रा निर्धारित करने के लिए एक कस्टम डिज़ाइन किए गए अत्याधुनिक ध्रुवीकरण सूक्ष्म प्रणाली का उपयोग किया। उन्होंने ये साबित किया है कि क्रिस्टल्स जो पाइज़ोइलेक्ट्रिक श्रेणी के हैं, अत्याधिक दबाव की वजह से विद्युत तैयार कर सकते हैं. वे अपने आप को जोड़ने में सक्षम होते हैं और अपनी क्रिस्टेलाइन नेचर बनाए रखने में कामयाब होते हैं. वह कई अनुप्रयोगों के लिए महत्वपूर्ण है।

प्रेसिशन इंजीनियरिंग में पाईजोइलेक्ट्रिक क्रिस्टल के अनुप्रयोगों की एक विस्तृत श्रृंखला होती है, जिसमें ट्रांसड्यूसर, मैकेनिकल सेंसर, एनर्जी हार्वेस्टर, बायोमेडिकल इम्प्लांटेबल्स आदि शामिल हैं। 

दूसरी तरफ प्रोफेसर भानु भूषण खाटुआ और उनके छात्र, आईआईटी खड़गपुर के डॉ. सुमंत करण ने विद्युत उत्पादन और उपकरणों में स्थायित्व के लिए पाइज़ोइलेक्ट्रिक क्रिस्टल्स की क्षमता का मूल्यांकन किया है.

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